karm ksise karna chahiye | हमको क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए

karm ksise karna chahiye | हमको क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए


नमस्ते दोस्तों welcome to God Gyan में आपका स्वागत है दोस्तों आज का हमारा टॉपिक है कि हमको क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए| हमको karm ksise karna chahiye करना अपने जीवन में उतारना चाहिए जिससे हमारे आने वाले भविष्य में हमारा नाम हमारा कीर्ति और हमारा विकास हो सके।  

karm ksise karna chahiye


तो चलिए इसी पर हम तो फिर शुरू करते हैं दोस्तों इस टॉपिक को आप पूरा पढ़िए और नीचे आप कमेंट में जरूर बताइए कि हमारा पोस्ट कैसे लगा तो दोस्तों जैसे कि आप जानते हैं। 

maha purusho ke karm par bichar 

  1. कर्म  आईना है जो हमारा स्वरूप हमें दिखा देता है अतः हमें कर्म का एहसानमंद होना चाहिए या वाक्यांश विनोबा भावे जी का है| कर्म शीलता और उदासी दोनों साथ साथ नहीं रहती है। काम को आरंभ करो अगर काम शुरू कर दिया है तो उसे पूरा करके ही छोड़ो या विनोबा भावे जी ने कहा है। 
  2. धर्मशील व्यक्ति के लिए हवाएं मधु बहाती हैं नदियों में मधु कहता है और औषधि में हो जाती हैं ऋग्वेद में लिखा हुआ है कर्म ही मनुष्य के जीवन को पवित्र और हिंसक बनाता है। 
  3. जो निष्काम कर्म की राह पर चलता है उसे उसकी परवाह कब रहती है और उसका आहेत साधन किया शक्ति छोड़ो और कर्म करो ,आशा रहित होकर कर्म करो निष्काम होकर कर्म करो, यह गीता की बात है जो भुलाई नहीं जा सकती है। 
  4. जो कर्म छोड़ता है वह गिरता है कर्म करते ही हुए भी जो उसका फल छोड़ता है वह चढ़ता है बस चाहे कितना ही सुंदर हो विश्वास ना करो भूतकाल का भी चिंता ना करो जो कुछ करना है उसे अपने पर और ईश्वर पर विश्वास रखता वर्तमान में करो। 

maha purusho ke karm par bichar 

  1. निष्काम कर्म ईश्वर  ऋणी बना देता है ईश्वर उसे  सूद  सहित वापस करने के लिए बाद हो जाता है जैसे तेल समाप्त हो जाता है दीपक बुझ जाता है उसी प्रकार कर्म के छेद हो जाने पर देव नष्ट हो जाता है। 
  2. फल मनुष्य के कर्म के अधीन है बुद्धि कर्म के अनुसार आगे बढ़ने वाली है तथापि विद्वान और महात्मा लोग अच्छी तरह विचार ही कोई काम करें खेल में हम सदा ईमानदारी का  पल्ला पकड़ कर चलते हैं अफसोस एकीकरण में हम इस ओर ध्यान तक नहीं देते हैं ,वही कार्य सबको अच्छा है जिसे बहुसंख्यक लोग अधिक से अधिक आनंद मिल सके जैसे फूल और फल किसी की पीड़ा के बिना ही अपने समय पर वृक्ष में लगे जाते हैं उसी प्रकार पहले के किए हुए कर्म को अपने फल भोग के साथ उल्लंघन नहीं करते हैं। 
  3. जहां  कर्म तो है ही उसमें कोई मुक्त नहीं है तथापि शरीर में प्रभु मंदिर बनाकर उसकी द्वारा मुक्ति प्राप्त करना चाहिए। कर्म की परिसंपत्ति ज्ञान में और कर्म का मूल भक्ति अथवा संपूर्ण आत्मसमर्पण में है। 
  4. कर्म सदैव सुख ना ला सका परंतु कर्म के बिना सुख नहीं मिलता है मनुष्य के कर्म ही उसके विचार की सबसे अच्छी व्यवस्था है कर्म ही पूजा और कर्म पालन भक्ति है, जीवन में कर्म का परिवर्तन करने की क्षमता से अधिक दुख में कुछ नहीं है। 

दोस्तों हमारा यह पोस्ट karm ksise karna chahiye महापुरुषों की वाणी  से लिया गया है आपको कैसा लगा नीचे आप कमेंट में जरूर बताएं। 

Spread the love
Scroll to Top