पाप के लिए स्टेटस इन हिंदी, महापुरुषों ने पाप के बारे में क्या कहा?

पाप के बारे में: किस-किस कर्म को पाप कहा गया है? कोई कर्म कब पाप बन जाता है और कब वही कर्म पुण्य होता है? इसका सटीक विश्लेषण किया है, हमारे ऋषि-मुनियों, मनीषियों एवं विश्व-प्रसिद्ध विचारकों ने। आइये। देखें, क्या है पाप और कैसा है इसका प्रभाव, महापुरुषों ने पाप के बारे में क्या कहा? यह जानते हैं वास्तव में गुनाह करना पाप करने की बराबर होता है. जिसका परिणाम बहुत खराब होता है. महापुरुषों ने पाप पर अपने वक्तव्य दिए जिन्हें आप जानेंगे.

महापुरुषों ने पाप के बारे में क्या कहा?

1-एक छेद भी जहाज को डुबो देता है और एक पाप भी पापी को नष्ट कर देता है। (जॉन बन्यन)
2-किसी कर्म को पाप नहीं कहा जा सकता, वह अपने नग्न रूप में पूर्ण है, पवित्र है। युद्ध में हत्या करना धर्म है, परन्तु दूसरे स्थल पर अधर्म। (जयशंकर प्रसाद)
3-दूसरे की स्त्री से अनुचित सम्बन्ध से बड़ा पाप दूसरा नहीं (प्रेमचन्द)

4-अनजाने में जो पाप होता है उसका प्रायश्चित है-देवता उसे क्षमा कर देते हैं किन्तु जान-बूझकर जो पाप किया जाता है, उससे कैसे बचा जा सकता है। (शरतचन्द्र)
5-संसार का पुरस्कार मृत्युह। (स्वामी रामतीर्थ)
6-पाप में पड़ना मानव स्वभाव है। उसमें डूबे रहना शैतान स्वभाव है, उस पर दुःखित होना सन्त स्वभाव है और सब पापों से मुक्त होना ईश्वर स्वभाव है। (लांगफेलो)

7-तब हम मृत्यु का स्मरण करते हैं तो हजारों पाप, जिन्हें हमने कीड़े-मकोड़ों की तरह पैरों के नीचे मसल डाला है, हमारे विरुद्ध फणदार सर्प की तरह खड़े होते हैं। (वाल्टर स्काट)
8-संसार में सब प्राणी स्वतन्त्र और स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के लिए आए हैं, उनको स्वार्थ के लिए कष्ट पहुँचाना महान् पाप है- (लोकमान्य तिलक)
9-प्राणघात, चोरी और व्यभिचार ये तीन शारीरिक पाप हैं। झूठ बोलना, निन्दा करना, कटु वचन एवं व्यर्थ भाषण ये चार वाणी के पाप हैं। परधन की इच्छा, दूसरे की बुराई की इच्छा, असत्य, हिंसा, दया-दान में अश्रद्धा ये मानसिक पाप हैं। (महात्मा बुद्ध)

पाप के लिए स्टेटस इन हिंदी

10-पाप की उजरत मृत्यु है। – (बाइबिल)
11-जिस प्रकार अग्नि-अग्नि का शमन नहीं कर सकती उसी प्रकार पाप-पाप का शमन नहीं कर सकता। (टालस्टाय)
12-कोई भी कर्म अपने आप पाप अथवा पुण्य नहीं हो सकता, ठीक जिस प्रकार बिन्दु या शून्य का स्वत: कोई मूल्य नहीं होता। (स्वामी रामतीर्थ)
13-पाप छिपाने से बढ़ता है।

14-माता, गौ और ब्राह्मण का वध करने वाले को जो पाप लगता है वही पाप शरणागत की हिंसा करनेवाले को भी लगता है (वेदव्यास)
15-मानवों के सम्पूर्ण पापों को मैं उनके स्वभाव की अपेक्षा उनकी बीमारी समझता हूँ। (रस्किन)
16-शरीर से तभी पाप होते हैं जबकि पाप मन में होते हैं। छोटे बच्चे के मन में काम नहीं होता, वह युवतियों के वक्षस्थल पर खेलता है, उसके शरीर में कोई विकार नहीं होता। (अज्ञात)

17-पाप कमजोर के रूप और धन पर इस तरह लपकता है जैसे बकरी पर चीता। (सुदर्शन)
18-पाप करने का अर्थ यह नहीं कि जब वह आचरण में आ जाए तब ही उसकी गिनती पाप में हुई। पाप तो जब हमारी दृष्टि में आ गया, विचार में आ गया, वह हमसे हो गया। (महात्मा गांधी)
19-दरिद्रता और धन दोनों तुलनात्मक पाप हैं। — (विक्टर ह्यूगो)
20-यदि मुझे विश्वास होता कि ईश्वर मुझे क्षमा कर देगा और मनुष्य मेरे पाप को न जान सकेंगे, तो भी पाप की अनिवार्य तुच्छता के कारण मुझे उसके करने में लज्जा आयेगी। – (प्लेटो)

गुनाह करना पाप करने की बराबर

21-असफलता नहीं, वरन् निकृष्ट ध्येय ही पाप है। – (टेनीसन)
22-पाप सदैव पाप है चाहे वह किसी आवरण में मंडित है। – (प्रेमचन्द)
23-जिस कार्य में आत्मा का पतन हो वही पाप है। – (महात्मा गांधी)
24-पाप की कल्पना आरम्भ में अफीम के फूल की तरह सुन्दर और मनोहारिणी होती है किन्तु अन्त में नागिन के आलिंगन की तरह विनाशमयी है। (हरिमाऊ उपाध्याय)

25-जैसे सूखी लकड़ियों के साथ गीली लकड़ी भी जल जाती है, उसी प्रकार पापियों के सम्पर्क में रहने से धर्मात्माओं को भी उनके समान दण्ड भोगना पड़ता है। (वेदव्यास)
26-पाप एक करुणाजनक वस्तु है, मानवीय विवशता की द्योतक है। उसे देखकर दया आती है, लेकिन पापके साथ निर्लज्जता और मदान्धता एक पैशाचिक लीला है, दया व धर्म की क्षमा के बाहर। (प्रेमचन्द)
27-पाप ईमानदारी को इस तरह निगल लेता है जैसे नदियों की उछलती हुई लहरें किनारे की हरियाली को। पाप का फल द: ख नहीं, किन्तु एक दूसरा पाप है। (अजात)

28-मनुष्य जब एक बार पाप के नागपाश में फँसता है, तब वह उसी में और भी लिपटता जाता है, उसी के गाढ़ आलिंगन में सुखी होने लगता है। पापों की शृंखला बन जाती है। उसी के नए-नए रूपों में आसक्त होना पड़ता है। (जयशंकर प्रसाद)
29-शरीर को रोगी और दुर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नहीं है। – (लोकमान्य तिलक)
30-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि समय आने पर कर्त्ता को उसके पाप का फल अवश्य मिलता है। (बाल्मीकि)

किस कर्म को पाप कहा गया

31-जिस प्रकार गरिष्ठ भोजन पेट में जाकर अवश्य दुःख देता है, उसी प्रकार पाप अपने लिए अनिष्टकर न प्रतीत होने पर भी बेटे, पोतों तक पहुँचकर अपना प्रभाव दिखाता है। (महात्मा गांधी)
32-एक पाप दूसरे पाप के लिए दरवाजा खोल देता है। (अज्ञात)
33-जहाँ किसी प्रलोभन से प्रेरित होकर तुम कोई पाप करने को उतारू हो, वहीं ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करो। (स्वामी रामतीर्थ)

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34-पाप में पड़ने वाला मनुष्य होता है, जो पाप पर पश्चाताप करता है वह साधु, जो पाप पर अभिमान करता है वह setan hai (फुलर)
35-संसार में दुर्बल और दरिद्र होना पाप है। (प्रेमचन्द)
36-अपना कर्तव्य करने के पहले दूसरे के कर्त्तव्य की आलोचना करने से पाप होता है। (शरतचन्द्र)
37-पापों की स्मृति पापों से अधिक भयानक होती है। (सुदर्शन)

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